मातृ–शिशु स्वास्थ्य और पोषण

 

श्वेता पाठक

सहायक प्राध्यापक (समाजशास्त्र), (अतिथि व्याख्याता), शासकीय मिनिमाता कन्या महाविद्यालय, कोरबा,

छत्तीसगढ़, भारत।

*Corresponding Author E-mail: shweta.krb@gmail.com

 

ABSTRACT:

पौष्टिक भोजन स्वास्थ्य के लिए एक मजबूत और महत्वपूर्ण आधारशिला है। संपूर्ण राष्ट्र में महिलाओं और बच्चों का सशक्तिकरण एवं सुरक्षा और उनका संपूर्ण विकास सुनिश्चित करना तथा पोषण युक्त आहार की अवधारणा को बढ़ावा देने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। अच्छा पोषण नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद स्वस्थ जीवन के आवश्यक नियम हैं। यह वह आधार है जिस पर संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति का निर्माण कर सकते हैं।

 

KEYWORDS: मातृ-शिशु स्वास्थ्य, पोषण

 

 


INTRODUCTION:

विश्व भर में कुपोषण और आहार संबंधी गैर संकामक बीमारियों में वृद्धि वास्तव में चिंता का विषय है। भारत में आज भी पाँच वर्ष से कम आयु के 68 प्रतिशत बच्चों की मौत का कारण कुपोषण है। हांलांकि भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान परिषद (ICHR) की एक रिर्पोट के अनुसार 1990-2017 के बीच कुपोषण से होने वाली मृत्यु में दो-तिहाई की कमी आई है। कुपोषण से लगभग 47 प्रतिशत बच्चों में मानसिक व शारीरिक विकास मंद गति से हो रहा है, जबकि 30 प्रतिशत गरीब लोग निर्धारित 2155 किलो कैलोरी से कम 1811 किलो कैलोरी का ही भोजन करते है। गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक भोजन न मिल पाने के कारण अक्सर उनमें खून की कमी (एनीमिया) के लक्षण के साथ उनके बच्चे कमजोर पैदा होते है, इस प्रकार यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। लौजेंट जर्नल, 2017 की एक रिर्पोट के अनुसार भारत मे प्रत्येक राज्य में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु के लिए कुपोषण एक जिम्मेदार कारक है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बच्चों को पोषण युक्त भोजन नहीं मिल पाता है। केंद्रीय स्वास्थय और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से 2016-2018 के बीच 1.2 लाख बच्चों के स्वास्थय एवं शारीरिक पोषण के राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित सर्वे में एक कारण माँ की अशिक्षा पाई गई।

 

कुपोषण क्या है शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होना, चाहे वह मात्रा में कम हो या असंतुलित। कुपोषण से शारीरिक और मानसिक विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

 

वैश्विक भूखमरी सूचकांक 2020 के अनुसार भारत 107 देशो की सूची में 94 वें स्थान पर था। प्राप्त रिर्पोट के अनुसार भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित है और बच्चों मे बौनेपन की दर 37.41 प्रतिशत है।

 

कुपोषण के कारण एनीमिया, घेंघा रोग, बच्चों की हड्डियाँ कमजोर होना आदि समस्या होती है, जिसके कारण शिशुओं की मृत्यु दर बढ़ने लगती है। इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार कई योजनाएँ चला रही है, जैसे- मनरेगा, राष्ट्रीय पोषण मिशन, मिड-डे मील, समेकित बाल विकास सेवा आदि।

 

महिला स्वास्थ्य में पोषण का महत्व:-

महिलाओं के स्वास्थ्य में पोषण के महत्व को कमतर नहीं आँका जा सकता। अधिकांश महिलाएँ परिवार और काम के मध्य संतुलन बनाते हुए अपनी आहार संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज कर देती हैं। नतीजन उनका स्वास्थ्य अंजाने में ही पीछे छूट जाता है। महिलाओं की कुल कैलोरी और भोजन की मात्रा की आवश्यकता पुरूषों की तुलना में कम हो सकती है लेकिन विशिष्ट विटामिन और खनिजों की उनकी जरूरतें, आमतौर पर ज्यादा होती है।

 

हार्मोनल असंतुलन:- महिलाओं के शरीर में मासिक धर्म, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति और यहाँ तक कि दैनिक जीवन में विभिन्न हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। संतुलित आहार ही इन हार्मोनो को नियंत्रित कर सकता है।

 

प्रजनन स्वास्थ्य:- प्रसव उम्र की महिलाओं के लिए पोषण एक महत्वपूर्ण, भूमिका निभाता है। फोलिक एसिड जैसे पोषक तत्व भूण के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि आयरन एनीमिया को रोकने मे मदद करता है।

 

हड्डी रोग:- महिलाओं को पुरूषों की तुलना में आस्टियो पोरोसिस का खतरा अधिक होती है। हड्डियों के घनत्व और मजबूती को बनाए रखने के लिए आवश्यक कैल्शियम और विटामिन डी को अक्सर महिलाओं के स्वास्थ्य आहार में शामिल किया जाता है।

 

मानसिक स्वास्थ्य:- आहार और मानसिक स्वास्थ्य के मध्य एक मजबूत संबंध है। मछली, मेवे और बीजों में पाए जाने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड जैसे पोषक तत्व मस्तिष्क के स्वास्थ्य और अवसाद और चिंता को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

 

महिलाओं के लिए सबसे अच्छे पोषण में विटामिन बी, मैग्नीशियम और आयरन शामिल है जो संज्ञानात्मक कार्य को भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।

 

उर्जा स्तर:- महिलाएँ अक्सर थकान महसूस करने की शिकायत करती हैं। इसमें पोषण की भूमिका हो सकती है। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा से युक्त संतुलित भोजन पूरे दिन ऊर्जा प्रदान करता है।

 

बच्चों में पोषण का महत्व:- पोषण बच्चों के स्वास्थ विकास की आधार शिला है। वे लगातार विकसित होते हैं। और इसके लिए उन्हें पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। ये पोषक तत्व उनके शारीरिक, संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास के लिए आधार होते हैं।

 

उचित शिशु पोषण जन्म से लेकर व्यस्कता तक बच्चे के निरंतर स्वास्थ्य के लिए मौलिक है। जीवन के पहले तीन वर्षों में संतुलित भोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।, क्योंकि यह रुग्णता और मृत्यु दर को कम करने, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में महती भूमिका निभाता है। पोषण से ही बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है और कुपोषण के दायरे से मुक्ति भी पाई जा सकती है।

 

पोषण सुरक्षा पर राज्य की संवैधानिक बाध्यताएँ:

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हर एक के लिए जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इस अनुच्छेद के तहत् भोजन का अधिकार सम्मिलित है। वहीं अनु. 47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन स्तर को उठाने के साथ ही जनस्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। मानव अधिकारो पर जारी अंर्तराष्ट्रीय घोषणा पत्र (1949) की धारा-25 हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त भोजन के अधिकार को मान्यता देती है।

 

आर्थिक, सामाजिक और संास्कृतिक अधिकारों पर अंर्तराष्ट्रीय सहमति दस्तावेज की धारा-11 (1966)- हर व्यक्ति को भूख से मुक्त रखने के संदर्भ में राज्य की जिम्मेदारियों की विस्तृत व्याख्या करती है।

 

माताओं की रक्षा हमारे भविष्य की सुरक्षा:

स्त्रियों में रक्त अल्पता (एनिमिया) या घेंघा रोग तथा बच्चों में सूखा रोग, रंतौधी और अंधापन भी कुपोषण के ही दुष्परिणाम हैं। गंभीर रक्त स्त्राव, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था से संबंधित संक्रमण, असुरक्षित गर्भपात से जटिलताएँ।

 

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल के वक्तव्य के अनुसार ’’लाखों परिवारों के लिए, बच्चे के जन्म का चमत्कार मातृ-मृत्यु की त्रासदी से प्रभावित हैं।‘’ किसी भी माँ को अपने बच्चे को जन्म देते समय अपने जीवन के लिए डरने की जरूरत नही होनी चाहिए खासकर तब, जब सामान्य जटिलताओं का इलाज करने के लिए चिकित्सकीय ज्ञान और उपकरण मौजूद हैं।

 

देश में मातृ व शिशु स्वास्थ्य में सुधार के लिए योजनाएँ:

(1) सुरक्षित मातृत्व आष्वासन (सुमन) - यह योजना प्रत्येक महिला और नवजात शिशु को निःशुल्क सम्मानजनक, आदरपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करता है।

(2) प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) गर्भवती महिलाओं को हर महीने की 9 तारीख को एक विशषज्ञ चिकित्सा अधिकारी द्वारा एक निश्चित दिन निः शुल्क सुनिश्चित और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जाँच प्रदान करता है।

(3) प्रजनन व बाल स्वास्थ्य (RCH) पोर्टल:- इसके माध्यम से प्रसवपूर्व देखभाल संस्थागत प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल सहित संपूर्ण सेवाओं का निर्बाध प्रावधान सुनिश्चित किया जाता है।

(4) स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की पहुँच को बेहतर बनाने हेतु शिविरों का प्रावधान।

(5) NCP कार्ड और सुरक्षित मातृत्व पुस्तिका का वितरण।

 

संदर्भ - सूची:

1.    डॉ कुमार नीशू, ‘‘महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा विषयक चुनौतियाँ”, प्रशांत पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 2018

2.      Gupta O & Jasra A “Information Technology in Journalism”, Kanishak Publishing House, New Delhi 2002.

3.    तोमर अल्का व भड़ाना अनुज कुमार ‘‘महिला सुरक्षा: मुद्दे व चुनौतियाँ” पेपरवेक्स, प्रकाशन, नई दिल्ली 2019

4.    शर्मा संदीप ‘‘महिलाओं के अधिकार”, साधना पब्लिकेशन हाउस, रोशन आरा रोड, दिल्ली 2006

5.    मेहरोत्रा ममता ‘‘महिला अधिकार”, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2010

6.    डॉ सिंह आभा ”महिला अधिकार प्रगतिशील प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली 2018

7.    जैन अनूप ‘‘महिला अधिकार शिक्षा” लक्ष्य पब्लिकेशन, दिल्ली 2014

8.    डॉ मलिक प्रताप ‘‘कामकाजी महिलाओं के अधिकार” वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2012

9.    मेढ़ सुषमा ”महिलाओं के कानूनी अधिकार”, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, दिल्ली 2022

10.   https://www.drishti las.com.hindi

 

 

Received on 02.07.2025      Revised on 15.11.2025

Accepted on 17.01.2026      Published on 20.03.2026

Available online from March 23, 2026

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):74-76.

DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00013

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